बस्तर
छत्तीसगढ़ में मौजूदा भाजपा सरकार सन 2022 तक नक्सल समस्या पूरी तरह खत्म करने का दावा कर रही है. पिछले कुछ महीनों में लगातार मुठभेड़ में नक्सलियों के पकड़े व मारे जाने से इस दावे को बल भी मिलता है.एक आंकड़े के मुताबिक, पिछले छह महीने में अलग-अलग घटनाओं में करीब 50 माओवादियों को पकड़ा गया या फिर मुठभेड़ में उनकी मौत हुई, लेकिन इस गंभीर समस्या को दूर करने के लिए बीहड़ में तैनात सुरक्षा बलों के जवानों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं. खासकर सीआरपीएफ को लेकर सामने आए आंकड़े तो यही बयान कर रहे हैं.
बस्तर में तैनात सीआरपीएफ के कई जवानों की बीमारी से मौत या फिर अवसाद के कारण आत्महत्या की खबरें भी सुर्खियों में रही हैं. कुछ घटनाओं में तो आपसी विवाद के चलते भी जवानों को जान गवानी पड़ी. हालांकि अधिकारी इस मामले में कुछ भी कहने से कतरा रहे हैं.सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2015 में सीआरपीएफ के पांच जवानों ने आत्महत्या की थी, जबकि वर्ष 2016 में 31 जवानो ने आत्महत्या की. वहीं वर्ष 2017 के 15 अप्रैल तक की अवधि में CRPF के 13 जवानों ने खुदकुशी कर ली.
अगर बीमारी के आकड़ों पर नज़र डालें, तो वर्ष 2016 में सीआरपीएफ के 92 जवान हार्ट अटैक, पांच जवान मलेरिया और 26 जवान डेंगू से ग्रसित होने की वजह से काल के गाल में समा गए. इसी तरह वर्ष 2015 में CRPF के 82 जवानों की मौत हार्टअटैक, 13 जवानों की मौत मलेरिया और डेंगू से हुई.सीआरपीएफ कैंप में एक जवान ने अपने साथी जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी. इसमें चार जवानों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि घटना में घायल एक जवान का राजधानी रायपुर में इलाज किया जा रहा है.
नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बस्तर में तैनात कुछ जवान बताते हैं कि उनके अधिकारी यहां आते हैं, उनकी परेशानियां और शिकायतें सुनते भी हैं, लेकिन फिर दिल्ली जाकर भूल जाते हैं. नक्सलियों से ज्यादा उन्हें खराब व्यवस्था के चलते तकलीफ होती है.


































